सृष्टि और लय पंचभूत से

4 weeks ago 13

गुलाब कोठारी, (प्रधान संपादक, पत्रिका समूह)

सृष्टि में पुरुष केवल एक ही है - अव्यय पुरुष। वही कृष्ण है, सबके हृदय में स्थित है। शेष जगत् केवल माया है-नश्वर है-सोम है। पुरुष अग्नि है, सत्य है। सोम आवरण है, हवि है, ऋत है, निराकार है। सृष्टि में दक्षिण भाग अग्नि का क्षेत्र (ऋत) है, उत्तर (सूर्य से आगे) सोम क्षेत्र है। दोनों एक-दूसरे की ओर प्रवाहित रहते हंै तथा ऋतु चक्र का निर्माण करते हैं। ऋतु चक्र की पुनरावृत्ति सम्वत्सर कहलाती है। यही सृष्टि विकास का कारण है।

सृष्टि में अग्नि-सोम (Energy and Matter) इसी रूप में कार्य करते हैं। ब्रह्म-माया इसी रूप मेें स्थूल जगत् का रूप लेते हैं। ब्रह्म पुरुष है-अग्नि है। प्रकृति इसका स्वभाव है। प्रकृति की तीन ही दिशाएं हैं। माया ब्रह्म की कामना है। पंचमहाभूत रूप सामग्री से निर्माण करती है। ब्रह्म और माया में कर्ता भाव नहीं है। कामना मात्र है। मानसी सृष्टि है। विचार रूप है। प्रकृति में भी कर्ता भाव नहीं है, पुरुष का स्वभाव है।

जब तक माया सुप्त है, सृष्टि नहीं होती। ब्रह्म है-बृंहण है-आनन्द है। यहां वायु (मातरिश्वा) का संयोग बुद्बुद् पैदा करता है। यही प्रथम सृष्टि-ब्रह्मा अथवा अव्यय पुरुष है। यही ऋक्-यजु:-साम (अग्नि/वेदत्रय) की सृष्टि है। ऋक् ही हृदय रूप में ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र है। यही मन-प्राण-वाक् है। मन में उठने वाली कामना ही प्राणों की सहायता से सृष्टि रूप लेती है। अव्यय के प्राण भाग से ही अक्षर या परा प्रकृति रूप लेती है। और वाक् भाग से क्षर या अपरा प्रकृति उत्पन्न होती है।

सूर्य परा प्रकृति या अक्षर सृष्टि के केन्द्र के रूप में कार्य करता है। माया यहां महामाया के रूप में कार्य करके सृष्टि को आगे बढ़ाती है। महामाया में अक्षर सृष्टि का अमृत भाव भी है और मत्र्य भाव भी। सूर्य केन्द्र के आगे अमृत सृष्टि है। यहां अक्षर-क्षर दोनों अमृत रूप हैं। अत: मह:, जन:, तप:, सत्यम्लोक अमृतलोक हैं। सृृष्टि यहां भी महाभूतों (पंच) की होती है। सूर्य केन्द्र से पृथ्वी पर्यन्त मत्र्यलोक में अक्षर-क्षर संस्थाएं भी मत्र्य रूप होती हैं। अमृत सृष्टि में सभी संस्थाएं एकाकार (वायुरूप) रहती हैं। मत्र्यलोक में जो सृष्टि रूप बनता है वह अमृतलोक से भिन्न होता है। सूर्य जगत् का आत्मा है। वही अमृत भाव में आत्मा बनकर आगे जाता है। मत्र्य भाग वर्षा रूप आकर शरीर-नश्वर सृष्टि का निर्माण करता है। स्थूल सृष्टि नर-मादा रूप में (अग्नि-सोम की प्रधानता से) उत्पन्न होती है।

हमारे शरीर में अमृत आत्मा (पुरुष) तथा शरीर दो भाग रहते हैं। शरीर को भी पुरुष रूप वैश्वानर अग्नि धारण करता है। इसके लिए कृष्ण कहते हैं - 'अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित:।' इस अग्नि के शान्त होते ही शरीर ठण्डा पड़ जाता है। इसे पुन: अग्नि को समर्पित कर दिया जाता है। पृथ्वी और सूर्य की अग्नि के योग से वैश्वानर अग्नि उत्पन्न होता है। पृथ्वी की भी एक संज्ञा 'सूर्य पत्नी' है। अन्न का पाक भी वैश्वानर अग्नि से ही होता है।

आत्मा का निर्माण सूर्य से आगे-मह:लोक में होता है। यह ब्रह्माण्ड का गर्भाशय है। ईश्वर इसी लोक में जीव की (बीज रूप में) स्थापना करते हैं। इसी बीज के केन्द्र में हृदय रूप ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र रहते हैं। इन्हीं की शक्तियों को प्रकृति कहा जाता है। इसी स्थान पर जीव की अहंकृति-प्रकृति-आकृति का निर्माण होता है। तीनों अविनाभाव हैं। बीज के साथ आत्मा की प्रकृति जुड़ती है, वीर्य (ब्रह्म, क्षत्, विड्) भी यहीं साथ होते हैं। इसी के अनुरूप जीव की आकृति तैयार होती है। मह:लोक मूलत: परमेष्ठीलोक का ही अंग है, जो कि पितर प्राणों का लोक भी है। जो सूर्य (स्वर्ग) का भेदन कर लेते हैं, वे पुन: यहां पहुंच जाते हैं - शुक्लमार्ग* से। शेष कृष्णमार्ग** से चन्द्रमा पर जाते हैं। पुरुष बीज के साथ पिछली सात पीढिय़ों के अंश (सह पिण्ड रूप में) प्रतिष्ठित हो जाते हैं। अत: पुरुष शुक्र में वृषा-पुंभ्रूण एवं स्त्री शोणित में योषा तत्त्व रहते हैं। पितर प्राण तथा कर्म शक्ति या वर्ण भी वृषा के अंग होते हैं। योषा में ये तत्त्व नहीं रहते। बीज पुरुष प्रतिनिधि है। बीज आत्मा-पुरुष का अंग होने से अमृत सृष्टि के साथ यात्रा करता है। इसकी यात्रा में मन की भाव भूमि की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। जिस प्रकार अन्तकाल में जो भाव मन में रहते हैं, वैसी ही योनि जीव को प्राप्त होती है; इसी प्रकार जीव ही स्वयं किसी योनि विशेष की ओर आकर्षित होता है।

जीव पहले शुक्र में प्रवेश करता है, वहां से गर्भाशय में जाकर स्त्री रज में मिल जाता है। तब उसे कर्मानुसार शुभ/अशुभ योनि (शरीर) की प्राप्ति होती है। जीव अपनी इच्छानुसार उस शरीर में प्रवेश करके सूक्ष्म/अव्यक्त होने के कारण कहीं आसक्त नहीं होता। वह तो ब्रह्म स्वरूप ही होता है। जीव गर्भ के समस्त अंगों में प्रविष्ट हो जाता है। वक्ष:स्थल को केन्द्र बनाकर समस्त अंगों का संचालन करता है। जीव के कारण ही गर्भ में चेतना आती है। जिस तरह जलता हुआ दीपक समूचे घर में प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार जीव की चैतन्य शक्ति शरीर के अवयवों को प्रकाशित करती है।

कुछ लोग मानते हैं कि युवा अवस्था इन विषयों की चर्चा के लिए नहीं है। बुढ़ापे में यही एक काम रहता है। जबकि अन्तिम समय में बुद्धि और मन स्थिर रख पाना कठिन है। 'विनाश काले विपरीत बुद्धि' कहा जाता है। कृष्ण ने चंचल मन को नियंत्रित करने के अभ्यास और वैराग्य दो ही मार्ग बताए हैं - 'अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।' (गीता 6/35)।

जो मनुष्य स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीरों में पूर्व का अभिमान त्यागकर कुछ भी चिन्तन नहीं करता और मौन रहकर ईश्वर में लीन रहता है, वही मुक्त है। वही मन के द्वारा अन्त:करण में आत्मा का साक्षात् करता है। शरीर तो संसर्ग में रत और जड़ है। बुद्धि के अधीन है। समस्त लोकों में विचरण करता है। वही काल चक्र है। यह काल चक्र, अगाध, मोह रूपी समुद्र है। मृत्यु के पश्चात् जीव इस पंचभौतिक शरीर को छोड़कर अपने कर्मों के अनुसार यात्रा पर निकल जाता है। जीव इस पंचभौतिक देह का परित्याग भी एक विशेष क्रम में करता है। इस क्रम को पंचमहाभूतों का प्रतिलोम क्रम कहते है।

पंचभूतों के विषय में अनुगीता कहती है कि इनकी क्रियाओं तथा विषयों से प्राणी मोहित हो जाते हैं। पंचभूतों का भी विनाश होता है क्योंकि इनकी उत्पत्ति हुई है - 'जातस्य हि धु्रवो मृत्युध्र्रुवं जन्म मृतश्च चÓ यह कृष्ण का उद्घोष सृष्टि के हर पिण्डाण्ड पर समान रूप से लागू होता है। जो भूत जिससे उत्पन्न होता है उसका प्रलयकाल में उसमें ही लय हो जाता है। भूतों की उत्पत्ति उत्तरोत्तर अनुलोम क्रम से तथा लय या विनाश प्रतिलोम क्रम से होता है। अर्थात् उत्पत्ति काल में आकाश-वायु-अग्नि-जल और पृथ्वी यह क्रम रहता है तथा नाश के समय पृथ्वी-जल-तेज-वायु और आकाश यह क्रम रहता है। जड़ और चेतन सब भूतों के विलीन होने पर भी धीर पुरुष (योगी) विलीन नहीं होते। वे सूक्ष्म शरीर धारण करके ब्रह्म लोक में रहते हैं।

इन सबका सार यह निकला कि पूर्व जन्मों के कर्मफल भोगने को शरीर मिलता है। सभी प्राणियों के शरीर इसी सिद्धान्त पर टिके हैं। मनुष्य यदि तटस्थ रहने का, स्थितप्रज्ञ रहने का अभ्यास कर ले और जीवन को नियति के अनुसार बहने दे, तो इसी जन्म में फल भोग लेगा। इस क्रम में आत्मा साक्षी भाव में रहेगा। जीवन, कारण शरीर में संचित कर्मों से संचालित रहेगा। नए कर्म जीव की इच्छा से होते हैं। प्रत्येक कर्म का फल भी अवश्य मिलता है। अत: नए कर्मों का सम्पादन ऐसा होना चाहिए कि उनमें हमारा न तो कर्ताभाव, न ही भोक्ता भाव रहे। तब हमको कोई फल भी भोगना नहीं पड़ेगा। तब किसी नए शरीर के धारण करने की आवश्यकता ही क्या है!

क्रमश:

शरीर ही ब्रह्माण्ड : पिता ही पुत्र बनता है



source https://www.patrika.com/opinion/gulab-kothari-articles-6845957/
Read Entire Article